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वैज्ञानिक

शिवरामकृष्णा चंद्रशेखर की जीवनी - Biography of Shivramakrishna Chandrashekhar in hindi jivani

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नाम : शिवरामकृष्णा चंद्रशेखर

जन्म दि: 6 अगस्ता 1930

ठिकाण : कोलकत्ता

मामा : सी वी रमन

व्यावसाय : भौतिक विज्ञानीक


प्रारंभिक जीवन :


        शिवरामकृष्णा चंद्रशेखर का जन्म 6 अगस्ता 1930 मे हुवा था | उनका जन्म कोलकता मे हुवा था | उन्होने 1951 मे नागपूर विश्वाविदयालय मे प्रथम रैंक के साथ भौतिक मे एमएससी की डिग्री प्राप्ता की थी | फीर उन्होंने अपने मामा सी वी रमन के मार्गदर्श्ंन मे भौतिकी मे डॉक्टरेट की डिग्री के लिए काम करने के लिए रमन रिसर्च इंस्टीटयूट बैंगलोर मे प्रवेश लिया था | उनके शोध का मुख्या विषय कई क्रिस्टल पर ऑप्टीकल रोटरी फैलाव आप से संबंधित था |


        उन्होने 1954 मे नागपूर विश्वाविदयालय से डीएसकी उपाधि प्राप्ता कि थी | फिर वो 1851 की प्रदर्शनी छात्रवृत्ती पर कैवेडिश प्रयोगशाला गए और मूख्या रुप से कैंब्रीज विश्वाविदयालय से न्यूट्रॉन और एक्सा रे प्रकीर्णन मे विलुप्त होने के सुधार के लिए अपने काम के लिए दुसरी डॉक्टरेट की पदवी प्राप्ता कि थी |


        चंद्रशेखर युनिवर्सिटी कॉलेज मे उनके बाद पोस्टडॉक्टरेल काम किया और लंदन मे रॉयल इंसटीटयूशन ने क्रिस्टलोग्राफिक समस्याओं से भी निपटा था | चंद्रशेखर जो अभी मैसूर विश्वाविदयालय मे शुरु किया गया था | उन्होंने अपना ध्यान तरल क्रिस्टल पर केंद्रीत कर दिया गया था | एक विषय जो उस समय सिर्फ एक लंबे हाइबरनेशन से निकल रहा था |


कार्य :


        चंद्रशेखर ने 1888 मे रांड जैसे अणुओ से बने तरल क्रिटल की खोज की गई थी | और 1920 और 30 के दशक मे हाले सैक्सोनी एनामल जर्मनी मे कई यौगिकी को संश्लेषित किया गया था | चंद्रशेख्र और उनके सहकर्मियों ने कोलेस्टरिक लिक्विड क्रिस्टड के आकर्षण ऑप्टिकल गुणो का अध्यायन करने के लिए परावर्तन के गतिशील सिध्दांत के अनुप्रयोग मे योगदान दिया है |


        जिसमे पीच के साथ एक पेचदार संरचना होती है | जो आमतौर पर 0.5 मी मी और आणविक सिध्दांत के विस्तार के लिए होती है | 1971 मे विज्ञान और प्रौधोगिकी विभाग ने इसका समर्थन शुरु करने के बाद चंद्रशेखर को आरआरआई मे एक लिक्किउ क्रिस्टल प्रयोगशाला स्थापीत कने के लिए आमंत्रित किया गया था |


        एक सिंथेटिक कार्बनिक रसायन विज्ञान प्रयोगशाला कि स्थापना कि गई थी | चंद्रशेखर और उनके सहयोगियों के सहयोग से भारत इंलेक्ट्रॉनिक्सा लिमिटेउ बैंगलोर ने घरेलू बाजार के लिए सरक एलसीउी के निर्माण के लिए स्वदेशी जानकारी विकसित कि इस तरह के कई यौगिक स्तंभ लिक्किउ क्रिस्टलीप चरणों को प्रदंर्शित करते है |


उपलब्धी :


        चंद्रशेखर की पूस्ताक कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी प्रेस वर्ष 1977 मे प्रकाशित हुवा था | पूस्ताक का विस्तुत दुसरा संस्कारण सन 1992 मे प्रकाशीत हुवा था | उन्होंने 1991 मे नोबेल पूरस्कार : प्रापता किया इस1996 मे इंरिंगन मेडल मिला था | और 1994 मे रॉयल मेडल भी मिला था | उनहे भटनागर पूरस्कार : सन 1972 मे मिला था |


        1987 और मेघनाद साहा 1992 भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का पूरस्कार : मिला था | भारतीय एसोसिएशन ऑफ द कल्टिवेशन ऑफ साइंस 1988 मे दिया गया | 1998 मे पदम भूषण पूरस्कार : मिला था | उन्हें कर्नाटक रा्योत्साव पूरस्कार : सन 1986 मे मिला ओर नाईट ऑफ द ऑर्डर ऑफ एकेडमीन पल्सा ऑफ द फ्रेंच गवर्नमेंट सम्मान 1999 मे मिला था |