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वैज्ञानिक

देबेन्द्र मोहन बोस की जीवनी - Biography of Debendra Mohan Bose in hindi jivani

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नाम : देबेन्द्र मोहन बोस

जन्म तिथी : 26 नवंबर 1885

ठिकाण : कलकत्ता, बंगाल प्रेसीउेंसी

व्यावसाय : भौतिक विज्ञानी

पत्नी : नलिनी सिरकार

मृत्यू : 2 जून 1975 89 वषै कि आयू


प्रारंभिक जीवनी :


        देब्रेन्द्र मोहन बोस का जन्म 26 नवंबर 1885 को कलकत्ता मे एक प्रसिध्दा ब्रम्हो परिवार मे हुआ था | वह मोहीनी मोहन बोस के सबसे छोटे बेटे थे | होमयोपॅथी मे खूद को कालीफाई करने के लिए यूएसए जाने वाले पहले भारतीयों मे से एक थे | आनंद मोहन बोस, उनके मामा थै | जबकी जगदीश चंद्र बोस उनके मामा थे | अपने पिता कि असामायिक मृत्यू के बाद, द्रबेद्र कि शिक्षा कि देखरेख उनके चाचा जेसी बोस ने कि थी |


        बंगाल इंजिनियरिंग कॉलेज शिवपूर से इंजिनियरिंग मे डिग्री हासिल करने की देवे्न्द्र कि योजना को उस समय काट दिया गया था | जब उन्हें मलेरिया का गंभीर दौरा पडा था | जेसी बोस के करीबी दोस्ता नोबेल पूरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हे भैतिकी को आगे बढाने का सूझााव दिया था | 1906 मे देवेद्र बोस ने कलकत्ता विश्वाविघ्यालय से प्रथम श्रेणी मे एम ए कि डिग्री प्राप्ता कि थी | उन्हेोंने अपने चाचा कि बायोफिजिकल और प्लॉट फिजियोलॉजिकल जांच मे भाग लिया था |


कार्य :


        देवेद्र मोहन बोस एक भारतीय भौतिक विज्ञानी थे | जिन्होंने कॉस्मिक किरणों कृत्रिम रेडियोधार्मिता और नयूट्रॉन भौतिकी के क्षैत्र मे प्रसिध्दा योगदान दिया था | 1907 मे वह कैक्ब्रिज के क्राइस्टा कॉलेज मे शामिल हुए, और जेजे थॉमसन और चार्ल्स थॉमसन रीस विल्सन सहित प्रमूख् भौतिकोविदों के साथ कैवेडिश प्रयोगशला मे काम किया था |


        1910 मे वह लंदन मे रॉयल कॉलेज ऑफ साइंस मे शामिल हो गए, जहां से उनहेांने 1912 मे भौतिकी मे डिप्लोमा और बीएससी प्रथम श्रेणी प्राप्ता कि थी | बाद मे वे कलकत्ता लौट आए और 1913 मे कोलकत्ता के सीटी कॉलेजम मे भौतिकी पढाया था | 1914 मे डीएम बोस को कलकत्ता यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस के नव स्थापित भौतिक के राशबिहारी घोष प्रोफेसर नियुक्ता किया

गया था | उन्हें विदेश मे अध्यायन के लिए घोष ट्रैवल फेलोशिप से सम्मानित किया गया था |


        बर्लिन मे हम्बोल्टा विश्वाविघ्यालय मे दो साल के लिए उन्नत भौतिकी का अध्यायन करने के लिए चुना गया था | बर्लिन मे देवे्रद्र को प्रोफेसर एएच रेजिन की प्रयोगशाला मे सौंपा गया था | चेम्बर मे तेती से बढने वाले अल्फा कणों के पारित होने के दौरान उत्पान्ना हुए पूनरावृत्ति प्रोटॉन के पटरियों कि तस्वीर लगाने मे सफल रहा था | प्रारंभिक जांच के परिणाम 1916 मे फिजिलॉन्सी जिटसक्रिस्टा नामक पत्रिका मे प्रकाशित हुए थे | मार्च 1919 मे पीएचडी कि उपाधि प्राप्ता करने के बाद वे भारत लौट आए| 


        जुलाई 1919 मे डी एम बोस कोलकत्ता विशविघ्यालय मे फिर से भौतिकी के प्रोफेसर के रुप मे राशबिहारी बोष केरुप शामिल हुए थे | 1932 मे उन्होंने प्रोफेसर सी वी रमन को भौतिकी के पालिट प्रोफेसर के रुप मे सफलता दिलाई थी | वह इटली के कोमो मे आयेजित कोमो सम्मोलन मे भाग लेने वाले केवल दो भारतीय भौतिकविदों मे से एक थे 1938 मे डीएम बोस संस्थान के संस्थापक जेसी बोस कि मृत्यू के बाद बोस संस्थान के निदेशक बने थे |


        1945 मे सीएसआयआर कि परमाणू ऊर्जा समिती मे बोस को परमाणू रसायन विज्ञान विशेषज्ञके रुप मे शामील किया गया था | समिती बाद मे परमाणू ऊर्जा आयेाग एईसी बन गई | बोस संस्थान के निदेशक के रुप मे डिएमबोस ने मौजूदा विभागों कि गतिविधियाँ का विस्तार किया था |


        ओर सूक्ष्म जीव विज्ञान के नए विभाग को भी खोला था | वह साधारण ब्रहम समाज के समर्पित कार्यकर्ता थे | और कई वर्षो तक इसके पदाधिकारी, अध्याक्ष, सचिव और कोषाघ्याक्ष के रुप मे कार्य किया था | वह 1953 मे लखनऊ मे भारतीय विज्ञान, काँग्रेस सत्र के महासचिव थे | बासे ने 1967 तक बोस संस्थान के निदेशक रुप मे कार्य किया था |


पुरस्कार और सम्मान : 


1) बोस विश्वाभारती के देशकोट्रटम्मा और आईएनएसए 1965 के मेघनाद साहा पदक के प्राप्ताकर्ता थे |

2) वह एशियाई सोसायटी के सदस्या दो बार राष्ट्रपति थे|

3) वह काँग्रेस एसोसिएशन 1953 के अध्याक्ष थे |


पूस्तके :


1) ए. ए. कन्सिस हिस्ट्री ऑफ साइंस इन इंडिया