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नाम : असीर जवाहर थॉमस जॉनसिंह
जन्म दि : 14 अक्टूबर 1945
ठिकाण : नागरकोइल, कन्याकुमारी तामिलनाडू
पत्नी : कोशल्या
व्यावसाय : वैज्ञानिक
प्रारंभिक जीवन :
एजेटी जॉनसिंह इनका जन्म 14 अक्टूबर 1945 मे नागरुकोइल, कन्याकुमारी जिला तामिळनाडू मे हुआ | वे एक भारतीय कशेरुक विज्ञानी है | वह पहले भारतीय थे जिन्होने एक स्वातंत्र स्तनधारी का अध्यायन किया था पश्चिमी घाट के बांदीपूर जंगले मे धोलो के उनके अध्यायन ने ढोल के गुप्ता जीवन को उजागर करने मे मदद की और उष्ण कटिबंधीय भारतीय जंगलो मे शीर्ष शिकारीयों मे से एक के रुप मे उनकी भूमिका पर प्रकाश डाला |
एजेटी जॉनसिंह बंगाल की की खाडी से दूर, तामिलनाडू के दक्षिणी छोर मे बडा हुआ, जहाँ मेरे लाल रेत की टीलों से ही समुद्र मेरे गॉव से अलग होता है | हॉलाकी वे जिस स्थान पर पले बढे है वह पश्चिमी घाट के वर्षा:छाया क्षेत्र मे है | 1968 मे मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज एमसीसी से जूलॉजी मे उनकी मास्टार डिग्री प्राप्ता करने के बाद वे अध्यानादर जानकी अम्मल कॉलेज शिवकाशी मे व्याख्यातता के रुप मे काम करने लगे |
उन्होने जूलॉजी का अध्यायन किया था | उन्होने उनसे वन्याजीवो के बारे मे जानकारी लेने और उनके बारे मे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया | वह पश्चमि घाट के लिए खतरे का अध्यायन करनेवाले पहले भारतीय पर्यावरण थे | बांदीपूर नेशनल पार्क मे ढोल के बारे मे जॉनसिंह का अध्यायन इस आधार पर टूट गयाथा कि यह एक भारतीय वैज्ञानिक व्दारा मुक्त करने वाले जानवर पहला अध्यायन था |
कार्य :
एजेटी जॉनसिंह ने कन्याजीवों के बारे मे जानकारी लेते और उनके बारे मे लिखने के लिए प्रोत्साहित किया | समय के दौरान उन्होंने 1973 औ 1975 मे पाच महिने के लिए मुटृमलाई डब्ल्यूएमएस के पास सिंगूर रेंज मे ढोल पर अध्यायन करने मे मदद की और अंतत्: 1970 के दशक के अंत मे बांदीपूर टाइगर रिजर्व मे ढोल पर पीएच डी का काम किया | जॉनसिंह एक व्याख्याता के रुप मे अपनी स्थायी नौकरी छोडनी पडी, लेकिन डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया ने उनका क्षेत्र अध्यायन करते समय उसका समर्थन किया |
स्मिथसोनियन इंस्टीटयूशन वाशिग्टन डीसी के स्वर्गीय डॉ इसेनबर्ग और डॉ.जॉन सीडनस्टिकर ने मुझो पोस्टाडॉक्टरेल फेलोशिप प्रदान करके अपार समथ्रन दिया, जिसने अमेरिका जाने और वहां कुछ अनुभव प्राप्ता करने मे सक्षम बनाया | जिम कॉर्बेट और डॉ.जॉर्ज शेखर प्रेरणा के स्त्रोत थे |
उन्होने संक्षेप मे बॉम्बे नेचूलर हिस्ट्री सोसाइटी के साथ काम किया और फिर फैकल्टी के रुप मे नव स्थापित वाइल्ड लाइफ इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया, देहरादून से जुड गए | उनके शोध मे एशियाई हाथी, एशियाई शेर लिंग हिमालयन आइलेक्सा संरक्षण फाउंडेशन के लिए प्रख्यात वन्याजीव जीवविज्ञान के रुप मे और डब्ल्यू डब्ल्यूएफ इंडिया के लिए मानद वैज्ञानिक सलाहकार के रुप मे काम करता है |
पूरस्कार :
1) उन्हे 2004 मे समाज के लिए सरकार से संरक्षण, जीवविज्ञान के लिए प्रतिष्ठित सेवा पूरस्कार से सम्मानित किया गया
2) भारतीय वन्यजीवों को जीवन भर सेवा के लिए कार्ल जीस वन्याजीव संरक्षण पूरस्कार 2004 को दिया गया
3) ABN AMRO अभयारण्या लाइफटाइम वन्याजीव सेवा पूरस्कार 2005 मे दिया गया
4) वह पदमश्री पूरस्कार से सम्मानित भि है
5) उनहे 100,000 एबीएन एमरो अवार्ड सहित कई अन्या प्रतिष्ठित पूरस्कार प्राप्ता किए है |
डॉ. एजेटी जॉनसिह के डॉक्टरल थीसिस मे ढोलस के परिस्थितिक अध्यायन को कवर किया गया है और बांदीपूरके बडे स्तनधारी शिकारीयों को 1983 के दौरान प्रकाशित किया गया है | उन्होने वैज्ञानिक पत्रिकाओं लोकप्रिय पत्रिकाओं और पुस्तक अध्यायों मे 200 से अधिक और रिपोर्ट भी प्रकाशित किए है | उन्होंने पहले से ही वन्याजीवों पर 2 लोकप्रिय किताबे लिखी है | उन्होंने साऊथ एशिया के वॉल्यूम मैमल्या – वॉल्यूम की पुस्तक भी लिखी है |