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नाम : मांडायम जीर्णानिधी थिरुमलाचार
जन्म : 22 सितंबर 1914
ठिकाण : मैसूर रा्जया, ब्रिटीश भारत
पिता : एम.जे.नरसिम्हान
व्यावसाय : मायकोलॉजिस्टा
प्रारंभिक जीवन :
एम.जे.थिरुमलाचार का पुरा नाम मांडायम जीर्णानिधि थिरुमलाचार है | एम.जे.थिरुमलाचार एक प्रसिध्दा भारतीय मायकोलॉजीस्टा थे | इतना नही बल्की वे मायक्रोबायोलॉजिस्टा प्लॉट पैथोलॉजिष्टा और जेयर्सनिधीएंडरन इंस्टीटयूट कैलिफोर्निया के सह संस्थापक भी रहे है | एम.जे.थिरुमलाचार का जन्म ब्रिटीश भारत के पूर्व राजया मैसूर मे 22 सितंबर 1914 को हुआ था | उनके पिता का नाम एम .जे.नरसिंम्कान था |
एम.जे.थिरुमलाचार की स्कुली शिक्षा बेंगलुरु के एक पडोस मे मल्लेश्वारम मे हुई थी सन 1944 मे मैसूर विश्वाविध्यालय से विज्ञान के डॉक्टर की कर्मा से पहले सेंट्राल कॉलेज बैंगलोर से स्त्रातक की उपाधि प्राप्ता की है | उसके बाद एम.जे.थिरुमलाचार विस्कॉन्सेन मैडिसन विश्वाविधालय चले गये वहाँ उन्होंने सन 1948 मे पीएचडी के निगरानी मे काम किया |
वाशिंग्टन के माइकोलॉजिस्टा जेम्सा जी डिक्सान भारत लौटने पर एम.जे.थिरुमलाचार ने बनारस हिंदू विश्वाविघालय मे माइकोलॉजी और प्लांट पैथोलॉजी विभाग के प्रमूख के रुप मे काम किया और इसके साथ ही बैंगलोर के सेंद्राल कॉलेज मे सेवा की | इसके बाद ही, वह सेंट्रल पोटैटो सिर्च इंस्टीटयूट पटना मे मुख्या प्लांट पैथोलॉजिस्टा के रुप मे सहभागी हूए थे |
एम.जे.थिरुमलाचार के परिवार एकत्रित रुप से देखा जाए तो चार प्रसिध्दा माइकोलॉजिस्टा हुए है | एक है एम जे नरसिम्हान पिता दुसरे एम जे नरसिम्हान बेटा और तिसरे उनके भतीजे एम सी श्रीवासन और चौथे वे खुद थे |
कार्य :
भारत आने के बाद एम.जे.थिरुमलाचार ने हिंदूस्तान एंटीबायोटिक्सा लिमिटेड एचएएल मे डिवीजन आर और डिवीजन डी का नेतृत्वा किया था | सन 1975 मे उन्होंने अनुसंधान के अधीक्षक के रुप मे सुपरमैन्टिंग की और एचएएल अपने नियमित करिअर की सेवा की जारी रखी | मिनेसोटा विश्वाविध्यालय मे, एम जे थिरुमलाचार ने पौधो और जानवरों के रोगो के नियंत्रण हेतू रसायनों का एक सेट न्यू केमोथेराप्यूटिक एजेंटों का विकास किया था |
उनके व्दारा विकसित कई की मौथेरप्यूटेंटस व्यावसायिक उपयोग मे है | पीली गोबर की मक्खी, स्टोफग्गा स्टॉकोरोरिया पर एंटोमाफोथोरा मुस्का कवक थिरुमलाचार ने कवक के लक्षण वर्णन के लिए एक पदूधाति की पहचान की | एम.जे.थिरुमलाचार इंटरनेशनल जर्नल से भी जुडे थे | इसके संपदाकिया बोर्ड के सदस्या के रुप मे एंटीबायोटिक्सा और सन 1969 से 71 के दरमीयान उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान आकादमीकी परिषद मे भी कार्य किया है |
उपलब्धि :
एम.जे.थिरुमलाचार अमेरिका की मायकोलॉजिकल सोसायटी के साथ साथ इंडियन माइक्रोबायलॉजिकल सोसायटी के सदस्या के मिला था |
पूरस्कार और सम्मान :
1) सन 1956 भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी ने एम.जे.थिरुमलाचार को अपना साथी चुना था|
2) सन 1967 को उन्हे INSA ने सुंदर लाला होरा पदक से सम्मानित किया था |
3) वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भारत सरकार की सर्वेाच्चा एजेंसी वैज्ञानिक और औघोगिक अनुसंधान परिषद, ने एम.जे.थिरुमलाचार को सन 1967 मे चिकित्सा विज्ञान मे उनके योगदान के लिए सर्वोच्चा भारतीय विज्ञान परस्कारों मे से एक विज्ञान स्वरुप भटनागर पूरस्कार से सम्मानित किया था |
4) उनके मृत्यू प्रश्चात मायकोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया ने उनके स्मरनाथे और शोध को बढाया देने के लिए युवा वैज्ञानिकों के लिए डॉ.एम जे थिरुमाला चार मेरिट पूरस्कार माइकॉजी मे उत्कृष्टता के लिए प्रदान किया जाता है |
पुस्तक ग्रंथसूची :
1) यूरोमिसेस होबसोनी बाइस पर टयूबरकुलिना नाम पुस्तक एम.जे.थिरुमलाचार ने सन 1941 मे प्रकाशित किया
2) सन 1942 मे उन्होंने बर्षेरिस अरिस्टाटा पर युकिनिया ड्रोगेसिस बटलर प्रकाशित किया
3) सन 1946 मे भारतीय कवक के संशोधन और परिवर्धन यह पुस्तक एम.जे.थिरुमलाचार के साथ साथ मुंदफूर बालचंद्र भवानीशंकर व्दारा लिखित है |
पेटेंट :
पोधे और पशु रोगो के नियंत्रण के लिए नए कीमेथेरेप्यूटिक एजेंट थिरुमचार| 21 अप्रैल 1999 को अखरोट क्रीक, कैलिफोनिया अमेरिका मे एम.जे.थिरुमलाचार का निधन हो गया |