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रानी चेन्नम्मा जीवनी - Biography of Kittur Chennamma in Hindi Jivani

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        रानी चेनम्मा भारत के कर्नाटक के कित्तूर राज्य की रानी थीं। सन् १८२४ में (सन् १८५७ के भारत के स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम से भी ३३ वर्ष पूर्व) उन्होने हड़प नीति (डॉक्ट्रिन ऑफ लेप्स) के विरुद्ध अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किया था। संघर्ष में वह वीरगति को प्राप्त हुईं। भारत में उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करने वाले सबसे पहले शासकों में उनका नाम लिया जाता है।


        रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के पहले ही रानी चेनम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। हालांकि उन्हें युद्ध में कामयाबी नहीं मिली और उन्हें कैद कर लिया गया। अंग्रेजों के कैद में ही रानी चेनम्मा का निधन हो गया।


जीवनी :


        चेन्नम्मा का जन्म भारत के कर्नाटक राज्य के बिलगावी जिले के छोटे से गांव काकटि में हुआ था, वह अपने पडोसी राजा की ही रानी बनी थी और देसाई परिवार के राजा मल्लासर्ज से उन्होंने विवाह कर लिया था| रानी चेन्नम्मा ने कित्तूर में हो रही ब्रिटिश अधिकारियो की मनमानी को देखते हुए बॉम्बे प्रेसीडेंसी के गवर्नर को सन्देश भी भेजा था लेकिन इसका कोई फायदा नही हुआ था। लेकिन ब्रिटिश अधिकारी कित्तूर की रानी के खजाने और बहुमुल्य आभूषणों और जेवरात को हथियाना चाहते थे| उस समय रानी के खजाने की कीमत तकरीबन 1.5 मिलियन रूपए थी|


        इसीलिये ब्रिटिशो ने 20000 आदमियो और 400 बंदूको की विशाल सेना के साथ आक्रमण किया था| अक्टूबर 1824 में युद्ध के पहले राउंड में ब्रिटिश सेना का काफी पतन हो चूका था और कलेक्टर और राजनैतिक एजेंट जॉन थावकेराय की हत्या कर दी गयी थी| चेनम्मा का मुख्य सहयोगी बलप्पा ही ब्रिटिश सेना के पतन का मुख्य कारण बना था| इसके बाद दो ब्रिटिश अधिकारी सर वाल्टर इलियट और मी| स्टीवसन को भी बंदी बना लिया गया था| लेकिन फिर ब्रिटिशो के साथ समझौता कर उन्हें बाद में छोड़ दिया गया था और युद्ध को भी टाल दिया गया था। लेकिन ब्रिटिश अधिकारी चैपलिन ने दुसरो के साथ हो रहे युद्ध को जारी रखा था|


        कर्नाटक प्रान्त में एक छोटा सा क़स्बा है कित्तूर. यह धारवाड़ और बेलगाँव के बीच बसा है. एक बार की बात है, बेलगाँव के काकति नामक स्थान पर नरभक्षी बाघ का आतंक फ़ैल गया. जन – जीवन संकट में था. उस समय कित्तूर में राजा मल्ल्सर्ज का शासन था. वे आखेट प्रिय थे. राजा उस समय काकति आये तो उन्हें बाघ के आतंक की सूचना मिली. राजा तुरंत बाघ की खोज में निकले. सौभाग्य से बाघ का पता शीघ्र ही चल गया और राजा ने उस पर बाण चला दिया.


        बाघ घायल होकर गिर गया. राजा तुरंत बाघ के निकट पहुंचे, लेकिन यह क्या ? बाघ पर एक नहीं दो – दो बाण गिरे थे जबकि राजा ने एक ही बाण चलाया था. राजा आश्चर्य में पड़ गया. तभी उसकी दृष्टि सैनिक वेशभूषा में सजी एक सुन्दर कन्या पर पड़ी. राजा को समझते देर न लगी कि दूसरा बाण कन्या का ही है.


        राजा को देखते ही कन्या कुद्ध स्वर में बोली, ” आपको क्या अधिकार था जो आपने मेरे खेल में विघ्न डाला. राजा कुछ न बोल सका. वह मन ही मन कन्या की वीरता और सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे देखता रह गया. इतने में राजा के अन्य साथी भी आ गये. राजा ने उन्हें बताया कि बाघ इस वीर कन्या के बाण से आहात होकर मरा है. सभी लोग कन्या की वीरता की सराहना करने लगे.


        अंग्रेजों की नीति डाक्ट्रिन आफ लैप्स के तहत दत्तक पुत्रों को राज करने का अधिकार नहीं था। ऐसी स्थिति आने पर अंग्रेज उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेते थे। कुमार के अनुसार रानी चेनम्मा और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध में इस नीति की अहम भूमिका थी। 1857 के आंदोलन में भी इस नीति की प्रमुख भूमिका थी और अंग्रेजों की इस नीति सहित विभिन्न नीतियों का विरोध करते हुए कई रजवाड़ों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। डाक्ट्रिन आफ लैप्स के अलावा रानी चेनम्मा का अंग्रेजों की कर नीति को लेकर भी विरोध था और उन्होंने उसे मुखर आवाज दी। रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया। 

 

        अंग्रेजों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। रानी चेन्नम्मा ने सन् 1824 में (सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम से भी 33 वर्ष पूर्व) उन्होने हड़प नीति (डॉक्ट्रिन आफ लेप्स) के विरुद्ध अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किया था।


कित्तूर पर हमला :


        अंग्रेज़ों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। आधा राज्य देने का लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोहियों को भी अपनी ओर मिला लिया। पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं। साथ ही उसने अपनी जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूँद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता।


        रानी का उत्तर पाकर धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर का किला घेर लिया। 23 सितंबर, 1824 का दिन था। किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने दस मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। इतने में अकस्मात क़िले के फाटक खुले और दो हज़ार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा मर्दाने वेश में अंग्रेज़ों की सेना पर टूट पड़ी। थैकरे भाग गया।


        दो देशद्रोहियों को रानी चेन्नम्मा ने तलवार ने मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेज़ों ने मद्रास और मुंबई से कुमुक मंगा कर 3 दिसंबर, 1824 को फिर कित्तूर का किला घेर लिया। परन्तु उन्हें कित्तूर के देशभक्तों के सामने फिर पीछे हटना पड़ा। दो दिन बाद वे फिर शक्तिसंचय करके आ धमके। छोटे से राज्य के लोग काफ़ी बलिदान कर चुके थे