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रानी

अवंतीबाई जीवनी - Biography of Rani Avantibai in Hindi Jivani

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रानी अवंतीबाई – Rani Avanti Bai मध्य भारत के रामगढ की रानी थी. 1857 की क्रांति में ब्रिटिशो के खिलाफ साहस भरे अंदाज़ से लड़ने और ब्रिटिशो की नाक में दम कर देने के लिए उन्हें याद किया जाता है. उन्होंने अपनी मातृभूमि पर ही देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था.


अवंतीबाई (Rani Avantibai) सन 1857 की अग्रणी थी | तत्कालीन रामगढ़ , वर्तमान मध्यप्रदेश के मंडला जिले के अंतर्गत चार हजार वर्गमील में फैला हुआ था | सन 1850 ईस्वी में विक्रमाजीत सिंह रामगढ़ की गद्दी पर बैठे | राजा विक्रमाजीत का विवाह सिवनी जिले के मनेकहडी के जागीरदार राव झुझारसिंह की पुत्री अवंतीबाई के साथ हुआ था | विक्रमजीत बहुत ही योग्य और कुशल शासक थे लेकिन धार्मिक प्रवृति के होने के कारण वह राजकाज में कम ,धार्मिक कार्यो में ज्यादा समय देते थे | उनके दो पुत्र शेरसिंह और अमानसिंह छोटे ही थे कि विक्रमाजीत विक्षिप्त हो गये और राज्य का सारा भार अवंतीबाई के कन्धो पर आ गया |


जब यह समाचार गोरी सरकार को मिला तो उसने 13 सितम्बर 1851 को रामगढ़ राज्य की कोर्ट ऑफ़ वार्डस के अधीन कर दिया | इस अपमान से रानी उस समय तो खून का घूंट पीकर रह गयी किन्तु उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वह इसका बदला लेकर रहेगी औ तब तक चैन से नही बैठेगी जब तक देश को स्वाधीन न करा लेंगी | इसी बीच अचानक राजा विक्रमाजीत की मृत्यु हो गयी | लार्ड डलहौजी की राज्यों को हडपने की निति का कुचक्र पुरे देश में तेजी से चलने लगा तो कई राजे-रजवाड़े और जागीरदार अंग्रेजो के खिलाफ संघठित होने लगे |


रानी अवंतीबाई ने आसपास के ठाकुरों , जागीरदारों और राजाओं को एकत्र कर अंग्रेजो के विरोध का फैसला किया | गढ़ा मंडला के शासक शंकर शाह के नेतृत्व में विद्रोह के लिए विजयादशमी का दिन निश्चित किया | क्रान्ति का संदेश गाँव गाँव पहुचाने के लिए अवंतीबाई ने अपने हाथ का लिखा पुर्जा भिजवाया “देश और आन के लिए मर मिटो या फिर चुडिया पहनो , तुम्हे धर्म इंसान की सौगंध है जो इस कागज का पता दुश्मन को दो “|


20 मार्च 1858 को इस वीरांगना ने रानी दुर्गावती का अनुकरण करते हुए युध्द लडते हुए अपने आप को चारो तरफ से घिरता देख स्वयं तलवार भोंक कर देश के लिए बलिदान दे दिया.


 


उन्होंने अपने सीने में तलवार भोकते वक्त कहा की हमारी दुर्गावती ने जीते जी वैरी के हाथ से अंग न छुए जाने का प्रण लिया था. इसे न भूलना बडों. उनकी यह बात भी भविष्य के लिए अनुकरणीय बन गयी वीरांगना अवंतीबाई का अनुकरण करते हुए उनकी दासी ने भी तलवार भोक कर अपना बलिदान दे दिया और भारत के इतिहास में इस वीरांगना अवंतीबाई ने सुनहरे अक्षरों में अपना नाम लिख दीया.


कहा जाता है की वीरांगना अवंतीबाई लोधी 1857 के स्वाधीनता संग्राम के नेताओं में अत्यधिक योग्य थीं कहा जाए तो वीरांगना अवंतीबाई लोधी का योगदान भी उतना ही है जितना 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का था.


नर्मदा पर्वत विकास संस्था के तहत जबलपुर जिले में बने डैम को भी उन्ही का नाम दिया गया है. पोस्ट डिपार्टमेंट ने भी रानी अवंतीबाई के नाम का स्टैम्प जारी किया है. महाराष्ट्र सरकार ने भी रानी अवंतीबाई के नाम का स्टैम्प जारी किया है.


क्रांति का प्रारंभ


देश के कुछ क्षेत्रों में क्रांति का शुभारम्भ हो चुका था। 1857 में 52वीं देशी पैदल सेना जबलपुर सैनिक केन्द्र की सबसे बड़ी शक्ति थी। 18 जून को इस सेना के एक सिपाही ने अंग्रेजी सेना के एक अधिकारी पर घातक हमला किया। जुलाई 1857 में मण्डला के परगनादार उमराव सिंह ठाकुर ने कर देने से इनकार कर दिया और इस बात का प्रचार करने लगा कि अंग्रेजों का राज्य समाप्त हो गया। अंग्रेज, विद्रोहियों को डाकू और लुटेरे कहते थे। मण्डला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंग्टन ने मेजर इस्काइन से सेना की मांग की। पूरे महाकौशल क्षेत्र में विद्रोहियों की हलचलें बढ़ गईं। गुप्त सभाएं और प्रसाद की पुड़ियों का वितरण चलता रहा। इस बीच राजा शंकरशाह और राजकुमार रघुनाथ शाह को दिए गए मृत्युदण्ड से अंग्रेजों की नृशंसता की व्यापक प्रतिक्रिया हुई। वे इस क्षेत्र के राज्यवंश के प्रतीक थे। इसकी प्रथम प्रतिक्रिया रामगढ़ में हुई। रामगढ़ के सेनापति ने भुआ बिछिया थाना में चढ़ाई कर दी। जिससे थाने के सिपाही थाना छोड़कर भाग गए और विद्रोहियों ने थाने पर अधिकार कर लिया। रानी के सिपाहियों ने घुघरी पर चढ़ाई कर उस पर अपना अधिकार कर लिया और वहां के तालुकेदार धन सिंह की सुरक्षा के लिए उमराव सिंह को जिम्मेदारी सौंपी। रामगढ़ के कुछ सिपाही एवं मुकास के जमींदार भी नारायणगंज पहुंचकर जबलपुर-मण्डला मार्ग को बंद कर दिया। इस प्रकार पूरा जिला और रामगढ़ राज्य में विद्रोह भड़क चुका था और वाडिंग्टन विद्रोहियों को कुचलने में असमर्थ हो गया था। वह विद्रोहियों की गतिविधियों से भयभीत हो चुका था।


 History of Rani Avanti Bai……………….


· वीरांगना रानी अवंतीबाई को सन 1857 ई : में हुई आज़ादी की जंग के लिए याद Rani Avanti Baiकिया जाता है।


· अवंतीबाई रामगढ़ के राजा विक्रमादित्य की रानी थी।


· वीरांगना रानी अवंतीबाई का जन्म 16 अगस्त सन 1831 ई : को मनकहनी के जमींदार राव जुझार सिंह के घर हुआ।


· राज्य सम्भालने का ज्यादातर काम अवंतीबाई ही किया करती थी।


· आपके दो पुत्र थे अमान सिंह और शेर सिंह।


· उस समय अंग्रेजों का राज हुआ करता था और 1857 की आज़ादी की क्राति अपने चरम पर फैली हुई थी।


· महारानी अवंतीबाई ने 1857 ई : की क्रांति में अंग्रेजों के साथ बहादुरी से डटकर सामना किया था।


· अवंतीबाई ने अंग्रेजों से लम्बा सघर्ष करते हुए अपने जीवन की आहुति दी थी।


· 20 मार्च सन 1858 ई : को युद्ध में अपने -आपको चारों तरफ़ से अंग्रेज सेना से घिरा हुआ देख खुद को तलवार से जख्मी कर देश के लिए बलिदान दिया था।


· शहीदी देते वक्त अवंतीबाई ने कहा के हमारी दुर्गावती ने जीते जी दुश्मन के हाथ से अंग न छुए जाने की प्रतिज्ञा ली थी।


· वीरांगना रानी अवंतीबाई का स्वतन्त्रता की आज़ादी में उतना ही योगदान रहा था जितना के 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का था